Thursday, March 5, 2009

शुकमुखादिह भागवतामृतं विगलितं शुभदैव-वशान्महत्
समनुलक्ष्यबुधान्यगदन्त्विदं त्यज सुधे वसुधे भज धन्यताम् ।
शुभ दैव-वश भागवत फल रस,
शुकमुख से अव्य विगलित सा
बुध देव कहें तुम त्यजो सुधा
धन्यता भजो धन्य है धरा ।
तो हे रसिक जन आप इस भागवत रस का पान कर धन्य होईये
जो तोते की चोंच से आहत किसी पक्वफल से गिरते हए रस धारा
के समान आपको प्राप्त है ।

अनिल काले
जबलपूर

Friday, February 13, 2009

वर्तध्वे चित्स्वरूपा: श्रुतिनियमबलात्सर्वदा जागरूका:
स्तद्युष्मान्प्रार्थयेSहम्मुहुरिदमखिलानाSSविधेराच कक्षात् ।
उत्प्रेक्षादि प्रयुक्त्या सद सदपि गिरा प्रोच्यते यद्यदस्मिन्
काव्ये तत्तत्कक्षमध्वम्निजनिजसदलंकारसम् भावलाभि: ।

वेद शास्त्र के पठन से प्राप्त बल बलवान
सूज्ञ-चेतन जागरूक आप सब हैं विद्वान ।
काव्य-शास्त्र नियमाथेति, रचना तनु-परिधान
उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकार मणि-कांचन के समान।
शक्ति से सद्-असद भेद से गुण-अवगुण को जान
प्रार्थना स्वीकारिये जन, कीजिये रसपान ।
आप सब रसिकारसिक वेदशास्त्र के जानने वाले हैं । काव्य शास्त्र इस रचना के परिधान हैं तथा उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकार इसके आभूषण है । अपनी ज्ञान शक्ति से इस रचना के गुण और अवगुण पहचान कर इसका रस पान करें और आनंद उठायें, यही मेरी नम्र विनंती है ।

अनिल काले
जबलपूर

Friday, February 6, 2009

रसज्ञरसवैरिणोरुभयमोव पृथ्वीचरन्न
चैकतरमेतयेरपि रसग्रहे प्रार्थये
कृतिर्ही सरसास्ति चेदिहरमेत पूर्व: स्वयं,
प्रनिम्न इव वारधोकुंभबंधु पर: ।

रसज्ञ-रसवैरि दोनों इस पृथ्वी पर
विचरण करते मुक्तभाव से जी भरकर
नही निमंत्रण देता हऊँ मै दोनों को,
कविता की रसशाला खुली है पर सबको
प्रनिम्न जल में अधो-वदन घटबन्धु प्लावन,
रसबैरि,मर्मज्ञ स्वयं, का रसमय जीवन ।

अनिल काले

कवि यहां रसिक तथा अरसिक दोनो में से किसी को भी निमंत्रण नही दे रहे हैं, अपितु ये कह रहे है कि उनकी ये काव्य
रूप मधुशाला सब के लिये खुली है । जो रसज्ञ हैं वे तो इस काव्य का मर्म समझते हैं क्यूंकि उनका तो जीवन ही रसमय है ।

Saturday, January 31, 2009

कालिन्दि पुलिने चरन्वदनजैर्वातै: सुवेणोर्नखे:
छिद्राणां परिचालनैर्व्रजसखीचेतांसि संचालयन
यान्तीनां रमणेषु मोहनिचयं संवर्धन्केशवो
ढुण्ढे: पण्डितमण्डनस्य विपदं विद्रावयन रक्षतु

कालिन्दी के तट पर विचरण,
भरे वंशि में अमिय पवन
अंगुलि करे छिद्र संचालऩ
कारण व्रज बाला चित चालन ।
वेणुनाद कर्षित ललना पति
मन, में हो निद्रा संवर्धन
वो केशव करें ढुण्ढि पण्डितवर
का विपत्तियों से रक्षण ।

Wednesday, December 10, 2008

नमो न मोहाधिविनाशिनो गुरो:,पदोपदोत्कृष्टपदं नयेद्यदि
नवेत्ता हित मध्वना कथं, समं स मंङ्क्षु र्स्वजनैर्भवैज्जन:

मोहनाश करने वाले सद् गुरु की कृपा स्मरें
गुरु नमन से बढ कर जग में और नही उपहार बडे
कैसे कोई सक्षम होगा हित अन-हित जानने हेतु,
स्वजनों के साथ गुरु को नित प्रणाम जो न करे
डगमग पद चलने वाले, यदि कोई मुमुक्षु हैं जग मे
हित अहित जानने हेतु वे सद् गुरु का नमन करे

अनिल काळे

Sunday, December 7, 2008

हरित्पालान्वेणोरमृतमधुरालापविवशान्
प्रकुर्वन्तङ्कालाभयसुखमहालाभदपदम्
विशालाक्षङ्कचिन्नवघनतमाला भमनिशम्
भजे गोधुग्बालानयनवनमालापरिचितम् ।

दिग्पाल हुए विव्हल अमृत के
समान मधुवंशी आलाप से
मृत्यु, काल, भय मुक्त हुए जन
अभय रूप सुख महा लाभ से ।

विशालाक्ष नवघन तमाल
आभा वाले ओ घनशाम
ग्वालिन-वधु नयन वनमालिका के
प्रियकर भगवन् तुम्हे प्रणाम ।

अनिल काले

Wednesday, December 3, 2008

तत्तप्रारब्ध दूरीकृतभविकचयांछुण्डयाकृष्य दिग्भ्यो-
भक्तांप्रत्यर्पयन्तं श्रवणपवनतस्तासु रिक्तासु चैषाम्
विघ्नान्प्रस्थापयन्तं पदविनतनृणा योगभद्राख्यकृत्यं
स्वांङ्गेनैवाचरन्तं शरणमिभमुखं तं दयालुं प्रपद्ये

कर्षित कर स्वशुण्ड से मंगल
दिगन्त से भक्तोंप्रति अर्पण
प्रकुशल रिक्त दिशा में पुनरपि,
कर्ण-पवन से विघ्न स्थापन ।

उपरोक्ताधि स्वांग कर्मो से
कृपा करें भक्तों पर भगवन
योगक्षेम नित निज भक्तों का
वहन करो, हे गजमुख वंदन ।