Tuesday, August 3, 2010

स्वह्रदयगर्भगानपि विजित्य न षट् प्रथमं-
सहजरिपून्स्वसुर्बत शिशुनवधीन्मधुपः ।
यदिदमकर्म वा सुरमुनिः कथमैधयत
क्षितिमथवा परीक्ष्य वपन्ति बुधा उचितम् ।।

स्वह्रदय गर्भसुत से षड्रिपु सहज पुत्र देवकी के
आश्चर्य मुनि ने उकसाये वध को, न वधे ।
अघ उत्पाद परीक्षा कंसाघ क्षितिघ्न पूर्व उत्तम वा
बीज वपन परीक्षण उत्तम विद्वान शिरोमणी का अथवा ।

ये षड्रिपु से देवकी के छह पुत्र जिनका वध करने को मुनि ने कंस को उकसाया
जैसे उसके पाप के चरम सीमा की परीक्षा ले रहे हों या धरती किसी विद्वान की तरह बीज की परीक्षा ले रही हो।

Friday, February 12, 2010

आत्माध्युपास्तिनिभृताहितभूरिवीर्य्या
संत्याजितोद्भवदपत्यफला निकामम् ।
भार्यैव शोकविकलस्ययदूत्तमस्य,
सत्कर्मपध्दथिरिवाकृत चित्तशुध्दिम् ।।

सत्कर्म पध्दति मार्ग का गन्तव्य अंतिम ब्रह्म है ,
इस पध्दति के अनुसरण से प्रछन्न तेजस लभ्य है ।
साफल्य दुर्लभ प्राप्य किन्तु जनित स्वर-सुख त्याग से,
वसुदेव को स्त्री लाभ तद्वत् सुत सुखेच्छा त्याग से ।
ब्रह्मकर्म उपासना को करे नित जो नियम पूर्वक
वसुदेव यदुवर वो बने प्रछन्न तेजोबल प्रमुख ।

Saturday, January 9, 2010

अद्योढकान्ताविपदग्रदग्धः कंसंश्रयाणि व्यसनोपहत्यै ।
इत्थं विमर्शे किल शूरसेनोर्भिन्नार्थरीत्या ह्रदिनिर्णSयो भूत ।।

नूतन परिणित भार्या सङ्कट मोचन को
वसुदेव सोचते किसकी शरण गहू मैं ।
कंस श्रयाणि को कंसंश्रयाणि समझ कर
वृष्णिकुमार पहुंचे निर्णय को सुखकर ।

अपनी इस भार्या के संकट को मै कैसे टालूं इस चिंता में व्यथित वसुदेव कंस के आश्रय की जगह कंसंश्रयाणि के सुखद निर्णय पर पहुंचे ।

Sunday, January 3, 2010

हन्तुं ते भगिनिं व्यधायिन पुरस्तेनाSसियष्टिर्द्विषत्-
कीलालार्द्रपृषद्वती परमहो दुष्कीर्तीरेवास्य सा ।
तस्या: स्वर्गपदादिरोहणलसध्देतोरिहोतोSनम
द्रागानूनमनूनदीप्तिरकरोतप्रोत्कंठकण्ठग्रहम् ।।

खड्ग जो अरिरक्तरंजित कंस की कीर्ती बढाता
आज अपनी भगिनि के वध हेतु क्यूं भाई उठाता ?
भाई प्रतापी, बहन अति प्रिय थी जिसे परिणय के पहले
स्वर्ग-गमन हो भगिनि का इस हेतु व्यग्र हो कंठ धरता ।

जिस प्रतापी कंस का खड्ग अपने पराक्रम के कारण शत्रु रुधिर से रंजित है, वही आज खड्ग बहन पर क्यूं उठा रहा है । जिस कंस को देवकी उसके विवाह से पूर्व तक अति प्रिय थी आज वही उसको स्वर्ग भेजने के लिये व्यग्र होकर उसका कंठ धर रहा है ।

Saturday, December 26, 2009

साध्वीमुदारां च गुणै प्रसक्ते प्राणव्ययेSपि प्रतिपालनीयाम् ।
कंसा स्वसारं निशितासिनाSपि क्रियामिवच्छेत्तुमसौ प्रयेते ।।

साधुता,उदारता गुण वयस कन्या देवकी के
गुण ये अनुपम, सुकोमल अंगसे रूपसी के ।
योग्य है रक्षण, स्वप्राण तनु उत्सर्ग जिसका
छेदनोद्यत है कंस खड्ग से अङ्ग अंङ्गना का ।

सुकुमार और कोमल अंगो वाली देवकी सुस्वभावी और उदार ह्रदया है। ऐसी गुणवान देवकी, जिसकी प्राणपण से रक्षा की जानी चाहिये दुष्ट कंस उसका अंग भंग करने को उद्युक्त है ।

Monday, December 14, 2009

प्रोज्झित्यात्मानमिध्दापदि पदमपथे स्थापयिष्यन्तमश्वान
सन्मार्गेसबध्ददृष्टीन्त्सजवमपि तिरश्चोनियातोगुणान्स्वान
अप्याकृष्टान्कराभ्यामनुपयत इव प्रग्रहान्प्रास्य हस्त
ग्राहं जग्राहं कंस: सपदि तदलकान्दुर्मतिरदुर्गुणांश्च ।

पशुयोनि जन्मित चपल अश्व वे फिर भी
संकेतानुसरण जनित सहज गुण रूपी ।
सवेग चलते गये मार्ग पर बांधे दृष्टी
गुण कर्षण से अवरुध्द मार्ग कर कंसी ।
हस्त प्रक्षेपण जनित मार्ग-च्युत अश्व
गुण छोड दुमति ने धरे केश-देवकी ।
यद्यपि ये अश्व पशुयोनी में जन्मे हैं पर अपने दृत गति से चलते जाते हैं वे अपना सहज गुण नही छोडते । परंतु कंस ने लगाम कस कर घोडों को अपने मार्ग से अलग कर दिया और उस दुर्मति अपने रथ से उतर कर देवकी के केश अपने मुठ्ठी में कस लिये ।

Monday, April 6, 2009

हन्तो दयिष्यति हतिस्तव नष्टबुध्दे विस्पष्टमष्टमसुतादिति कष्टमस्याः
इत्युग्रसेनजनुषः सुरवर्त्मवाणी बाणी बभूव ह्रदयांतर मर्मभेत्री।।
उग्रसेन के सुत ह्रदय के मर्म का भेदन करे
बाण सदृश आकाश वाणी से समस्त जन डरे
देवकी के आठवे सुत रूप अन्त तव उदित होगा
हन्त कष्टम् हे नष्टबुध्दी काल को वरना पडेगा ।

उस आकाश वाणी को सुन कर सारे पुरजन भयभीत हो गये और कंस का ह्रदय विदीर्ण होगया ।
हे दुष्टबुध्दी कंस तेरा काल, तेरा अंत, देवकी के आठवे पुत्र (संतान ) के रूप में जन्म लेगा ।