Sunday, May 5, 2013




शूरान्वयो यमलघून् विनिहत्य योधान्
जन्येशु मे जलकमप्यति रन्ध्रिताङ्गम ।
कर्ता कियत्यहमिहेति भयादिवासौ
मार्गम् तयोरदिश ढूढशरोत्करापि ।।

संग्राम शूर यदुकुलवर शौरि सुंदर तनु प्रबल बलशाली
धारीतीर्थ हत महत् योध्दा स्वविक्रम रंध्रितहृनांशुमाली
चंडांशु मम निज पितर को जब देव पराक्रम बन्धनकारी
जलपूरित कालिंदी भय से मार्ग दे श्रीकृष्ण शुभकारी ।।

शूरवीर वसुदेव जिनका सरीर सौष्ठवपूर्ण और बलशाली है तथा
जिन्होने अपने पराक्रम से चोटिल शरीर सो भी अनेक बडे योध्दाओं को
धरा पर सुलाया है ऐसे वसुदेव को भय से यमुना भी मार्ग दे रही है ।
श्रीकृष्ण इस प्रकार शुभकारी हुए हैं ।

Tuesday, March 12, 2013


कामक्रोधादिवक्र कचममहादंष्ट्रयादः प्रचार-
व्यालोलद्भ्रान्ति च क्रोध्भटमपि नचिरात्स्वस्तिसंसारवार्धिम् ।
वेशन्ताल्पम् विधत्तेदधतमुत ह्रदोभ्यन्तरे यं निगूढं
सौरि शौरिंकथं तं बहिरपि च ततः संवहन्तं रुणध्दु ।।



करालं तीक्ष्ण वृहद दन्त जल जन्तु सम विचरण,
भक्त ह्रदय जलधि में काम क्रोध नक्र भ्रमण
विनायास संचारित भ्रान्ति चक्र हेतु हनन,
करें रक्षण भक्तों का ईश गुप्त दृढ्वासन
यदुवर जो करें गमन, शिरोधार्य कर भगवन्
सौरि क्या करे रोधित उस शौरि का मार्गक्रमण ।

वसुदेव बिना किसी बाधा के विचलित हुए, तेज बहती यमुना में आगे बढ रहे हैं .
भक्त के ह्रदय में जिस प्रकार कामक्रोध रूपी मगर विचरते हैं वैसे ही विक्राल जन्तु
इस यमुना जल में फुंफकार रहे हैं पर जिसके सिर पर स्वय भगवान विराजमान हैं ऐसे
शूर वीर यदुवर वसुदेव का कोई कैसे मार्ग रोधित कर सकता है ।

Tuesday, January 29, 2013


असान्तताभागमुना दधेSयः कृष्णस्वरूपीह तु सान्तताभाक् ।
मयेति मत्वा निगडो नु शौरेर्युक्तं विशीर्णो बहुलोहजुष्टः ।।


अविनाशी कृष्ण स्वरूप हैं शिरोधार्य श्री वसुदेव के,
कृष्ण वर्ण श्रृंखला विनाशी हूँ निगडित मैं यदुपद से,
विगलित हुई लोह श्रृंखला इस तर्क वितर्क में,
उचित ही, शौरिपद से टूट गई, गल गल गई न्यून गंड से ।

य़े कृष्ण स्वरूप प्रभु वसुदेव के आराध्य हैं उन्हें इस कृष्ण वर्ण श्रृंखला का नाश करना है क्यूं कि वे यदुपद से जुडे हैं। इस विवाद में वह श्रृंखला स्वयंही टूट कर बिखर गई मानो न्यूनगंड से गल गई हो ।

Sunday, January 20, 2013


सुपर्वतोषाय यथा य़थाक्रमं प्रभुःस खर्वोSपि पुरा स्म वर्धते
पितृप्रियायाSत्र महालपि स्वयं लघुर्बभूवेन्दुरिव स्वपूर्वजः

लघुतम वामन रूप से शनैः शनैः विशालता प्रभु धारण करते
पूर्व समय देवों को संकट विमुक्त आनन्दित करते
श्रीकृष्ण जन्म से मात-पिता प्रमुदित हो इस हेतु से
कुल संस्थापक चंद्र के समान विशालता त्यज बने शिशु से

अपना वामन रूप धीरे धीरे बढा कर प्रभु विशाल रुप धारण करते हैं और (बलि को पाताल में धकेल कर ) देवों को संकटमुक्त तथा आनंदित करते हैं । अपने पूर्वज चंद्र के समान ( जो कि सदैव घटता बढता है ) प्रभु वालकृष्ण के रूप में जन्म लेकर माता पिता को सुख पहुंचाते हैं ।

Thursday, August 23, 2012

Saturday, April 7, 2012

आद्यन्तयोर्देवपदाङ्किताभ्यां व्यलोकि मध्योपि तथा पितृभ्याम्
यत्तादृशां पुण्यविशेष भाजाम् देवः कुतोप्युज्झति नो सनीडम् ।।


आद्यंत देव पदांकित दोनो
पितृमध्य स्वयं स्थापित मानो
स्थान ,समय कोई हो,पुण्यात्मा
सन्निकट सदा प्रभु को जानो ।।

देव तथा पितरों के मध्य स्वयं को स्थापित मान कर,
पुण्यात्मा के रूप में ईश्वर को सदा अपने निकट अनुभव करो ।

Sunday, March 11, 2012

स्ववंशसंभूतिमिमामपीह प्रागवत्किमु श्रोश्यति दुर्मनीषः।
इत्युग्रचिन्तार्धतनुकृतत्वा दिवोददान्नष्टकलाष्टको ग्लौ ।।

निज अंत रूप श्रीकृष्ण नाशार्थ कंस संकल्पित,
पूर्व के सप्त गर्भो सा अष्टम प्रसव कंस सूचित,
निजवंश कृष्ण संभव को ले है शशांक अति चिंतित,
सप्तपुत्र नाश स्वरूपी सप्तकला खोकर निज की
अष्टम तिथी श्रावण वद्य की, नभ-उदित चंद्र अर्धरात्रि ।।

अपने अंतरूप श्रीकृष्ण के नाश के लिये कंस द्वारा संकल्प किया हुआ,
देवकी के पहले सात गर्भों के समान यह आठवा प्रसव (जिसकी सूचना भी उस कंस को है) जब चांद्रवंशीय कृष्ण जन्म लेने वाले हैं, चंद्र के चिंता का कारण है ।
सात पुत्रों के नाश स्वरूप अपनी सात कलाओं को खोकर
यह चितातुर चंद्र आज कृष्णपक्ष के अष्टमी की आधीरात को आधा रह गया है ।