Monday, February 13, 2012

श्रीमद्भागवतव्यंजनम्

पीताकाचघटीवसंभृतमषी श्रीकृष्णसंधारणात्,
गर्भेकेतकगर्भगौरतनुरप्यन्तर्बहिर्देवकी ।
कृष्णांगी समदृष्यतेह न भयात्कंसस्यसोSपि ध्रुवं,
तत्छायाप्रतिबिम्बनस्य कलनात्कालस्य कालानलः ।

वासंती कांच-पात्र संभृत मषिमय सी ये रूपसी,
केतकी गर्भगौर स्वर्ण-आभा तन्वंगी ये गौर सी ।
सुलक्षणा ये देवकी कृष्णांगी ना पापी कंस भय से
है कालानल कंस काल श्रीकृष्ण प्रतिबिम्ब से ।

वासंती रंग के कांचपात्र में स्याही भरी हो ऐसा शामल लग रहा है तन्वंगी देवकी का रूप जो वास्तव में केतकी के समान गोरी है । कृष्ण को गर्भ में धारण करने के कारण ऐसा प्रतीत होता है, कंस के भय के कारण नही । कृष्ण तो कंस के काल हैं ।

2 comments:

Shanti Garg said...

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Er. Shilpa Mehta said...

वाह - कितना सुन्दर भाव :)